14 September 2010

माँ सो रही है
शायद थक गयी होगी
इस बार घर आने में थोडा ज़्यादा वख्त हुआ

माँ बूढ़ी हो रही है
शायद सब होते होंगे
मेरे जवां कदम तो मुझे काफी दूर ले गए हैं

माँ कम बोलती है आज कल
पहले डांटती बहोत थी
अब सिर्फ प्यार मिलता है

माँ इंतज़ार कर रही है मेरा
सामने हूँ पर अभी पहोंचा नहीं
दुआ है वख्त पर पहोंच जायुं

माँ ने शायद मेरी हसरत के आगे फिर घुटने टेक दिए
इस बार तो मैंने जिद भी नहीं की

माँ मै बात कर रहा हूँ तुझसे
सुनती रहना

1 comments:

Instinctive Curiosity said...

Bahut sundar likha hain Shahnawaz. Dil hi se likha hain, kuch kehne ka toh ab hain nahi. Badhiya. All my prayers with you, I pray less often than others waise :)