03 May 2010

ख़ासा वख्त हो जाता है आसमान देखे हुए
भूल जाता हूँ आज कल सर ऊपर उठाना

जो सामने है वो देखना नहीं चाहता
जो पीछे छूट गया वो देखा सा लगता है

एक धुन है जो अन्दर मुसलसल बज रही है
और धक्कों से झूमते हुए एक महफ़िल सज रही है

जो बेतहाशा नाचे तो नींद अच्छी आयेगी
वर्ना उम्र ऐसे ही कट जाएगी

न होगी ख़ुशी से शिरकत
और न माफ़ी मिलेगी

हर लम्हे से तस्कीन नाकाफी मिलेगी...

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